संयुक्त राज्य अमेरिका सोवियत संघ तथा जापान, NCERT सार संग्रह | United States Soviet Union and Japan in Hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको संक्षिप्त इतिहास NCERT सार संग्रह “महेश कुमार वर्णवाल” Book का अध्याय “संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ तथा जापान” (United States, Soviet Union and Japan in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। इसमें हम आपको सोवियत संघ ने जापान के साथ क्या किया?, Soviet-Japanese War of 1939 और who won the soviet-japanese war in Hindi को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

संयुक्त राज्य अमेरिका सोवियत संघ तथा जापान

  • संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ तथा जापान दो विश्व युद्धों के मध्य की प्रमुख शक्तियों के रूप में उभरकर सामने आए।
  • प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ये तीनों राज्य कुछ समय तक एक दूसरे के मित्र रह चुके थे।
  • युद्ध के पश्चात् रूस को बहिष्कृत कर दिया गया था, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका ने शांति-संधियों के प्रारूप तैयार करने में और युद्धोत्तर दुनिया की रचना में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह विश्व को सबसे प्रभुत्वशाली आर्थिक शक्ति बन गया।
  • रूस, जो बाद में सोवियत संघ की स्थापना होने पर उसका हिस्सा बना था, युद्ध क्रांति, गृह-युद्ध तथा विदेशी हस्तक्षेप के दौर में यूरोप के सर्वाधिक क्षत-विक्षत देश के रूप में सामने आया।
  • 1930 के दशक के अंत तक रूस एक प्रबल आर्थिक तथा सैनिक शक्ति का रूप लेकर उभरा।
  • जापान इस युद्ध के परिणामस्वरूप एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र की प्रबलतम शक्ति के रूप में उभरा और उसमें इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा बढ़ने लगी।

संयुक्त राज्य अमेरिका

  • जिस वर्साय संधि का प्रारूप तैयार करने में अमरीकी राष्ट्र‌पति वुडरो विल्सन ने प्रमुख भूमिका निभाई थी उसको अमेरिकी सीनेट ने नामंजूर कर दिया।
  • राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति पदों के 1920 ई. के चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी ने विल्सान की डेमोक्रेटिक पार्टी को पराजित कर दिया।

आर्थिक विकास के बावजूद आर्थिक दुःखी जीवन

  • युद्ध के दौरान यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को तो भारी क्षति हुई थी, किंतु अमेरिकी अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ था।
  • कोई भी युद्ध अमेरिका की सरजमी पर नहीं लड़ा गया, और उसके नगरों, उद्योगों तथा खेत-खलिहानों को कोई क्षति नहीं पहुंचा था।
  • युद्ध की समाप्ति के साथ ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था का विस्तार, जो युद्ध का ही परिणाम था, अचानक रूक गया जिसमे एक गंभीर संकट उपस्थित हो गया।
  • लगभग एक लाख कारोबारियों का दिवाला निकल गया और लगभग 50 लाख लोग बेरोजगार हो गए। परिणामस्वरूप श्रमिक अशांति फैली और हड़तालों का दौर प्रारम्भ हो गया।
  • 1919 ई. में लगभग 3500 हड़तालें हुई, जिनमें लाखों श्रमिक शामिल हुए। ये हड़तालें महीनों चलती रहीं। लेकिन इसके शीघ्र बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था तीव्र गति से विकास के मार्ग पर अग्रसर हो चली।
  • संयुक्त राज्य में प्रौद्योगिकीय उन्नति के आधार पर औद्योगिक विस्तार आरंभ हो गया। वह विश्व के मुख्य ऋणदाता राष्ट्र के रूप में सामने आया और यूरोप के ज्यादातर देश उसके कर्जदार बन गए।
  • अमेरिका के तीव्र औद्योगिक विस्तार का एक प्रमाण यह है कि 1929 ई. में उस देश में पचास लाख से ज्यादा कारें बेची गई।
  • औद्योगिक विस्तार के साथ-साथ इस देश को आर्थिक सत्ता और भी केंद्रित होती चली गई। हजारों छोटी-छोटी कंपनियों को कुछ बड़ी कंपनियों ने अधिग्रहित कर लिया।

🔺पूॅंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं की एक खास विशेषता विभिन्न उद्योगपतियों के मध्य की स्पर्धा थी। यह कहावत थी कि जो बात जनरल मोटर्स के लिए अच्छी है वह पूरे अमेरिका के लिए अच्छी है। यह कंपनी कारों की प्रमुख निर्माता थी।

1929 ई. का घोर संकट

  • 1929 ई. के आरंभ में नव निर्वाचित राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर ने घोषणा की, कि “हमारा देश संसाधनों से परिपूर्ण है, मन को प्रेरणा और स्फूर्ति देने वाली भव्य सुंदरता से संपन्न है, सुख-सुविधा और अवसरों का उपयोग करती लाखों गृहस्थियों से भरपूर है।”
  • उसने आगे कहा कि देश का भविष्य उज्जवल और आशाजनक है। इसके कुछ ही महीने पश्चात् 24 अक्टूबर, 1929 को एक बड़ा संकट प्रारम्भ हो गया जिसे, महामंदी (ग्रेट डिप्रेशन) के नाम से जाना जाता है।
  • इस आर्थिक संकट का बुनियादी कारण स्वयं इस अर्थव्यवस्था के स्वरूप में समाहित था।
  • प्रोद्यौगिकीय प्रगति तथा बढ़ते हुए लाभ के कारण उत्पादन में जो भारी वृद्धि हुई उससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई कि जो कुछ उत्पादित किया जाता था उसे खरीद सकने वाले लोग की संख्या सीमित थी।
  • गैर-कृषक आबादी का 5 से 7 प्रतिशत हिस्सा इस सदी के तीसरे दशक के दौरान बेरोजगार रहा।
  • लगभग दशक भर के अभूतपूर्व औद्योगिक विकास के बावजूद अमेरिका में आधे से ज्यादा परिवार किसी तरह गुजारा भर करने लायक थे या इससे भी दयनीय हालत में जी रहे थे।
  • जो वस्तु उत्पादित किया जा रहा था उसे खरीदने की स्थिति में वे बिल्कुल नहीं थे। अनुमान लगाया गया है कि 1929 ई. में पूरी व्यक्तिगत आय का लगभग एक तिहाई हिस्सा आबादी के पाँच प्रतिशत लोगों के हाथों में चला जाता था।
  • ऐसे लोगों (जिन्हें किसी भी अर्थ में अर्थव्यवस्था की पूँजीवादी प्रणाली का आलोचक नहीं कहा जा सकता) ने यह स्वीकार किया है, कि क्रय-शक्ति का बुनियादी असमान वितरण इस घोर संकट की प्रारम्भ का एक मुख्य कारण था।
  • शेयरों की कीमतों में गिरावट आने के साथ संकट प्रारम्भ हुआ कीमतें गिरने से लोग घबराहट में अपने-अपने शेयर बेचने के लिए व्याकुल हो उठे।
  • इससे शेयरों की कीमतों में और भी कमी आई। फलतः शेयर बाजार बिल्कुल धराशायी हो गया।
  • इसके बाद बैंकों का दिवाला निकलने का दौर प्रारम्भ हुआ। 1929 ई. और 1932 ई. के बीच 5700 बैंकों का दिवाला निकल गया और 3500 बैंकों ने अपने-अपने कारोबार समेट लिए।
  • उद्योगों को बैंकों से कर्ज नहीं मिल सकते थे और जो वस्तु वे तैयार करते थे, उसकी बिक्री नहीं होती थी।
  • फलतः उद्योग बंद होने लगे। इससे लोग बेरोजगार हो गए और चीजों की माँग में और भी कमी आ गई। जिसके परिणामस्वरूप और भी कारखाने बंद हो गए।
  • 1929 ई. में बेराजगारों की संख्या 15 लाख थी, जो 1930 ई. में 50 लाख, 1931 ई. में 90 लाख और 1932 ई. में 1 करोड़ 30 लाख पर पहुँच गई।
  • 1932 ई. में संयुक्त राज्य के कुल श्रम बल का 25 प्रतिशत से अधिक बेकार था। कृषि उत्पादों के मूल्यों में भारी गिरावट आई। लाखों किसानों को भूमि उनके हाथ से निकल गई और वे निराश्रय हो गए।

नस्ली भेदभाव

  • 1930 ई. का दशक अमेरिकी जनता के लिए एक भयावह काल था। सबसे दयनीय हालत अश्वेत लोगों की थी। उनमें दो लाख से अधिक सैनिक थे, जिन्हें प्रथम विश्व युद्ध में यूरोप के मोर्चों पर भेजा गया था।
  • गोरों की भीड़ द्वारा अश्वेतों की हत्या की वारदातें बढ़ गई थी। यहाँ तक कि युद्ध से लौटे अश्वेत लोगों को भी अपमानित और प्रताड़ित किया जाता था।
  • नस्ली अलगाव और भेदभाव पूरे देश में फैल गया था और यह दक्षिणी राज्यों तक ही सीमित नहीं रह गया था।
  • देश के कई हिस्सों में गोरों के कुक्लक्स क्लान जैसे आंतकवादी गिरोह सक्रिय हो गए थे।
  • आर्थिक मंदी के दौर में अमेरिका के अश्वेत लोगों की स्थिति और भी शोचनीय हो गई। गोरों की माँग थी कि जब तक हर एक गोरे को रोजगार नहीं मिल जाता तब तक कोई भी रोजगार अश्वेतों को न दिया जाए।
  • 1930 ई का दशक अमेरिकी समाज में आमूल परिवर्तनवाद का काल था। इस कालावधि में वहाँ एक प्रबल श्रमिक आंदोलन उभरने लगा था। संयुक्त राज्य अमेरिका की कम्युनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी का गठन पहले ही हो चुका था।
  • इस अवधि में उसकी भी शक्ति बड़ी और उसने काले और गोरे श्रमिकों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। काले लोगों ने भी नस्लवाद से लड़ने के लिए स्वयं को संगठित किया।
  • इस काल में दो सरासर अन्यायपूर्ण मुकदमों ने संयुक्त राज्य को हिलाकार रख दिया। इनमें से एक मुकदमा था सैकों और वेंजेती नामक दो इटालवी अप्रवासियों का, जिन्हें हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उनके विरुद्ध जुटाए गए सबूत आमतौर पर संदेह को नजर से देखे गए और दोनों को मृत्यु दंड दे दिया गया।
  • अमेरिका तथा विश्व के अन्य भागों में आमतौर पर यह माना गया, कि ये दोनों निर्दोष थे और उन्हें एक झूठे मामले में फंसाया गया था ताकि इस भय को बढ़ावा दिया जा सके कि संयुक्त राज्य अमेरिका को तोड़-फोड़ करने वाले तत्वों की ओर से क्रांति का खतरा है।
  • दूसरा मुकदमा स्कॉट्सबरो मुकदमें के नाम से जाना जाता है। यह वस्तुतः नस्लवाद का मामला था।
  • 1931 ई. में दो गोरी वेश्याओं के साथ बलात्कार करने के आरोप में नौ अश्वेत लड़‌कों पर मुकदमा चलाया गया।
  • जूरी के सभी सदस्य गोरे थे। उन्होंने नौ में से आठ को मृत्यु-दंड दे दिया। इन लड़कों को बचाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान छिड़ गया, जिसे विश्व जनमत का भी समर्थन प्राप्त था।

नई नीति

  • 1929 ई. की आर्थिक मंदी जिसका प्रारम्भ तो अमेरिका से हुआ लेकिन अंत में उससे यूरोप के सभी देश प्रभावित हुए और उसका प्रर्याप्त प्रभाव विश्व के प्रत्येक देश पर पड़ा।
  • अमेरिका में आर्थिक संकट के कुछ गंभीरतम परिणामों का निवारण 1933 ई. के पश्चात् आरंभ हो गया।
  • यह फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट के राष्ट्रपतित्व काल में हुआ, जो सर्वप्रथम 1932 ई. में इस पद के लिए निर्वाचित हुए और उसके बाद लगातार तीन बार निर्वाचित हुए।

🔺फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट ने सुधार का जो कार्यक्रम आरंभ किया उसे न्यू डील अर्थात् नई नीति कहते हैं।

सोवियत संघ

  • रूस के राष्ट्रों के अधिकारों का एक घोषणापत्र जारी किया गया। जिसमें रूसी साम्राज्य के गैर-रूसी राष्ट्रों के शोषण की समाप्ति की घोषणा कि गई।
  • सभी जातियों के आत्मनिर्णय, समानता तथा संप्रभुता के अधिकारों की घोषणा की गई।
  • जारशाही द्वारा की गई सभी गुप्त संधियों को रद्द कर दिया गया और पूर्व के देशों पर जारी औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने का आह्वान किया गया।
  • 1918 ई. में रूस को रूसी सोवियत समाजवादी गणसंघ (रशियन सोवियत फेडरेटिव सोशलिस्ट रिपब्लिक) घोषित किया गया।
  • प्रथम विश्व युद्ध के समाप्त होते-होते बोल्शेविकों ने भूतपूर्व रूसी साम्राज्य के प्रायः सभी प्रदेशों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। सिर्फ एस्टोनिया, लाटविया, लिथुआनिया और फिनलैंड जो कि अब स्वतंत्र राज्य बन चुके थे, उससे बाहर रह गए थे।
  • पोलैंड एक स्वतंत्र राष्ट्र बन गया था। इसी समय गृह-युद्ध भी प्रारम्भ हो गया था और विदेशी सैन्य हस्तक्षेप आरंभ हो गया अतः 1920 ई. में गृह-युद्ध और विदेशी हस्तक्षेप समाप्त हो गए।

युद्ध साम्यवाद और नवीन आर्थिक नीति

  • प्रथम विश्व युद्ध तथा उक्त क्रांति के बाद छिड़े गृह-युद्ध और विदेशी हस्तक्षेप के कारण रूस की अर्थव्यवस्था पूर्णतः क्षत-विक्षत हो गई थी। इसके तत्काल बाद वहाँ अकाल पड़ा। इन सब कारणों से लाखों लोगों की मृत्यु हो गयी।
  • 1921 ई. में औद्योगिक उत्पादन 1914 ई. के पहले के मुकाबले केवल 13 प्रतिशत हुआ। पूर्ण विध्वंस से बचने के लिए सोवियत सरकार ने कुछ कठोर कदम उठाए।
  • भू-स्वामियों से उनके बड़े-बड़े खेत खलिहानों को छीनकर किसानों में बाँट दिया गया। किसान जो कुछ भी पैदा करते थे, उसमें से उन्हें अपनी न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति कर सकने लायक पैदावार अपने पास रखकर बाकी सब सरकार को देना पड़ता था। इस अन्न से आबादी का बाकी हिस्सा अपना पेट भरता था।
  • लगभग किसी भी वस्तु की न ही खरीद हो सकती थी और न ही बिक्री। उद्योगों से जो उत्पादन होता था, वह श्रमिकों और अन्य लोगों को उनकी न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए मजदूरी के तौर पर दे दिया जाता था।
  • इन कार्रवाइयों के फलस्वरूप जिस प्रणाली का जन्म हुआ वह युद्ध-साम्यवाद के नाम से प्रसिद्ध है।

🔺1921 ई. में नवीन आर्थिक नीति नामक एक नई नीति अपनाई गई।

  • युद्ध साम्यवाद के तहत उठाए गए कदम वापस ले लिए गए। किसानों के उत्पादन पर उनका नियंत्रण पुनः स्थापित कर दिया गया, वेतन नकद दिया जाने लगा और वस्तुओं का व्यापार फिर से प्रारम्भ हो गया।
  • कुछ उद्योगों में प्रबंध की गैर-सरकारी व्यवस्था आरंभ की गई और बहुत से छोटे उद्योगों की खाननी के हाथों में रहने दिया गया। बहुत बड़ी संख्या में सहकारी समितियों की स्थापना की गई।
  • 1921 ई. में देश के एक बड़े भाग में फसलें बहुत नष्ट हो गई जिससे व्यापक भूखमरी की स्थिति पैदा हो गई। पीड़ितों को प्रारम्भिक राहत पहुँचाने का देशव्यापी कार्यक्रम आरम्भ किया गया।

औद्योगिक विकास तथा सामूहिकीकरण

  • नवीन आर्थिक नीति 1928 ई. तक लागू रही जिसके बाद एक के बाद एक पंचवर्षीय योजनाओं के जरिए आर्थिक विकास में तेजी लाने का प्रयत्न किया गया।

🔺पहली पंचवर्षीय योजना 1929 ई. में पंचवर्षीय योजना और दूसरी 1934 ई. में आरम्भ की गई।

  • जब द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ हुआ तब तक सोवियत संघ (जो 1924 ई. में स्थापित हुआ और सोवियत रूस जिसका हिस्सा बन गया) एक प्रबल औद्योगीकृत और सैनिक शक्ति बन चुका था।
  • अब तक कोई भी अन्य देश अपना औद्योगीकरण इतनी तेजी से नहीं कर पाया था, जितनी तेजी से सोवियत संघ ने किया।
  • यह सफलता उसने अपने ही आंतरिक संसाधनों का उपयोग करके पूर्ण रूप से राज्य की देख-रेख तथा स्वामित्व में प्राप्त की थी।
  • नवीन आर्थिक नीति के दौर में जो निजी उद्यम थे, उनको राज्य ने अपने हाथों में ले लिया और उद्योग तथा व्यापार पर निजी स्वामित्व एवं नियंत्रण को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

🔺सोवियत संघ विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के प्रभाव से बचा रहने काला विश्व का एकमात्र देश था।

  • बड़े-बड़े राजकीय फार्मों की स्थापना की गई। बाकी फार्मों का सामूहिकीकरण कर दिया गया।
  • किसानों की अलग-अलग जोतों को मिलाकर सामूहिक फार्म बना दिए गए जिन्हें कोलखोज कहा जाता था।
  • 1930 के दशक के अंत तक लगभग सम्पूर्ण भूमि सामूहिक फार्मों के अधीन हो चुकी थी।
  • किसान इन फार्मों पर सामूहिक रूप से काम करते थे व भूमि के किसी टुकड़े पर उनका कोई मालिकाना हक नहीं थी।
  • संपन्न किसानों के वर्ग को मिटा दिया गया। ऐसा माना जाता है कि समूहीकरण की प्रक्रिया की इस अवधि में लाखों किसान मारे गए।

सोवियत समाजवादी गणतंत्र संघ

  • 1924 ई. में घोषित एक नए संविधान के अनुसार रूस, जॉर्जिया, आर्मेनिया, तुर्कमेन, यूक्रेन, अजरबैजान, कॉकेसस आदि सभी गणतंत्र एक संघ के अधीन लाए गए। इसका नाम था-सोवियत समाजवादी गणतंत्र संघ (यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स)
  • 1936 ई. में जब एक अन्य संविधान लागू किया गया तब तक सोवियत संघ में 11 गणतंत्र शामिल हो चुके थे। इन गणतंत्रों का गठन राष्ट्रीयता तथा सभी राष्ट्रों की समानता के सिद्धांतों के आधार पर किया गया था।
  • संविधान के अनुसार उन्हें सोवियत संघ से अलग होने का भी अधिकार था। इस संविधान से भूतपूर्व रूसी साम्राज्य के प्रत्येक राष्ट्र को अपनी भाषा और संस्कृति को पराश्रय देने का अधिकार प्रदान किया गया।

एकदलीय शासन से तानाशाही की ओर

  • बोल्शेविक दल, जो बाद में सोवियत संघ के साम्यवादी दल (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ द सोवियत यूनियन) के नाम से प्रसिद्ध हुआ, ने देश पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
  • इस दल के अंदर धीरे-धीरे समस्त लोकतंत्र समाप्त होता गया। बोल्शेविक दल का विकास जार की तानाशाही के समय हुआ था।
  • तत्कालीन व्यवस्था को क्राति द्वारा समाप्त करने के लिए एक प्रयत्नशील दल के रूप में उसकी एक महत्वपूर्ण किस्म की कार्य-पद्धति बन गई थी। जिसके तहत दल के अंदर वाद-विवाद हो सकते थे और कभी-कभी वे काफी उग्र रूप भी धारण कर सकते थे, लेकिन एक बार बहुमत से कोई फैसला हो जाने पर उसके सदस्य उस पर अमल करने को बाध्य होते थे।
  • जब तक रूसी क्रांति का सबसे बड़ा नेता लेनिन जीवित रहा, दल की यह कार्य-पद्धति कायम रही। 1924 ई. में लेनिन की मृत्यु के पश्चात् दल के अंदर सत्ता के लिए तीव्र संघर्ष प्रारम्भ हो गया। दल के अंदर पहला बड़ा संघर्ष स्टालिन और ट्रॉटस्की के मध्य हुआ। स्टालिन दल का महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) बन गया था।
  • क्रांति के दौरान और बाद में विदेश मंत्री तथा युद्ध मंत्री के रूप में ट्रॉटस्की की भूमिका को सिवाय लेनिन के और किसी से कम महत्वपूर्ण नहीं माना जाता था।
  • 1927 ई. में इस संघर्ष में स्टालिन को जीत हुई और ट्रॉटस्की को दल से और बाद में 1929 ई. में देश से निकाल दिया गया।
  • 1940 ई. में स्टालिन ने ट्रॉटस्को को मैक्सिको में हत्या करवा दी जहाँ वह पिछले कुछ वर्षों से रह रहा था।
  • अलग-अलग मामलों में स्टालिन की नौतियों से असहमति प्रकट करने वाले दल के दो अन्य नेताओं जिनोवीव और बुखारिन को समाप्त कर दिया गया।
  • जो देश एक नए प्रकार के समाज और एक श्रेष्ठतर सभ्यता को रचना करने का दावा कर रहा था, उसी देश में 1930 ई. वाले दशक में धीरे-धीरे एक व्यक्ति की तानाशाही कायम हो गई।
  • सम्पूर्ण सत्ता स्टालिन के हाथों में सिमट आई। उसे हर ज्ञान का स्रोत माना जाने लगा। उसके फैसले पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती थी।
  • कुछ समाजवादी चिंतकों और नेताओं के लेखन में सर्वहारा की तानाशाही को समाजवादी समाज की रचना के एक चरण के रूप में चित्रित किया गया था।
  • सोवियत संघ की राजनीतिक व्यवस्था ने वास्तव में जो स्वरूप धारण किया, उसका मतलब सत्ताधारी दल की तानाशाही थी और चूंकि उस दल पर स्टालिन का वर्चस्व था, इसलिए प्रकारांतर से उसका अर्थ स्टालिन का अधिनायकत्व था।
  • 1953 ई. में स्टालिन की मृत्यु के बाद सोवियत संघ में समाजवाद की रचना में गंभीर विकृतियाँ उत्पन्न हो गई।
  • 1934 ई. में लेनिनग्राव (अब सेंट पीटर्सबर्ग) को कम्युनिस्ट पार्टी के नेता किरोव की हत्या कर दी गई। इस घटना ने शीघ्र व्यापक रूप धारण कर लिया और वृहत सफाई अभियान (द ग्रेट पर्ज) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

जापान (विस्तारवादी नीति)

  • कुछ काल तक चीन तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में आर्थिक उपायों के सहारे जापान अपने प्रभुत्व को शांतिपूर्ण ढंग से प्रसारित करने को नीति पर चलता रहा।
  • प्रथम विश्व युद्ध के बाद जापान की पहली बड़ी आक्रामक कार्रवाइयों में से एक यह थी कि 1931 ई. में उसने चीन पर एक विनाशकारी आक्रमण किया।
  • 1938 ई. में जापान ने जर्मनी के साथ कोमिंटर्न के विरुद्ध एक संधि की। उसकी महत्वाकांक्षी योजना पूर्व एशिया और प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करने की थी, जबकि इटली के साथ मिलकर जर्मनी शेष विश्व में यही करने का उद्देश्य बाँध रहा था।

🔺युद्ध के बाद जापानी अर्थव्यवस्था का विकास जारी रहा और वह सूती कपड़े रेयान तथा कच्चे रेशम का सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया।

  • कच्चे माल, मशीनों तथा खाद्य पदार्थों के लिए दूसरे देशों पर उसकी निर्भरता ने उसकी अर्थव्यवस्था को कुछ निर्बल बना दिया था।
  • इससे उत्पन्न कुछ समस्याओं को हल करने के लिए उसने अपने लोहा-इस्पात तथा भारी इंजीनियरी उद्योगों का खूब विस्तार किया।
  • जापान के लोग अपनी समृद्धि के लिए चीन के संसाधनों तथा सामग्री को अपने अधिकार में करना आवश्यक मानते रहे।

राजनीतिक दमन

  • जापान का औद्योगिक विस्तार श्रमिकों के घोर शोषण की बुनियाद पर हुआ।
  • उद्योगों और बैंकों पर जैबत्सु नामक मालदारों के एक छोटे से गुट का नियंत्रण स्थापित हो गया था। जैबत्सु का जापानी सरकार और राजनीतिज्ञों से आंतरिक सम्बंध था।
  • श्रमिकों की रहन सहन की अवस्था दयनीय थी। किसानों को हालत भी कुछ बेहतर नहीं थी। देश में व्यापक असतोष और अशांति फैल गई थी। 1919 ई. में ऊँची कीमतों को लेकर देश में चारों और अशांति फैल गई।
  • मजदूरी सामान्यतः इतनी कम थी कि श्रमिक इन कीमतों पर चावल खरीद ही नहीं सकते थे। इस अशांति को आमतौर पर चावल-विद्रोह कहा जाता है।

🔺कारखानों, अमीरों के घरों और चावल के व्यापारियों की दुकानों पर आक्रमण किए गए और उन्हें जला दिया गया।

  • साम्यवादी और समाजवादी लोकतांत्रिक दलों का गठन हुआ जिन्होंने श्रमिकों तथा किसानों को अत्याचारपूर्ण अर्थतंत्र के विरुद्ध संगठित करने की कोशिश की।
  • 1925 ई. में खतरनाक विचारों को दबाने के लिए शांति-रक्षा कानून बनाया गया।
  • इस कानून के अनुसार शासन के स्वरूप में परिवर्तन करने या निजी संपति के उन्मूलन की हिमायत करने वाला कोई संगठन बनाने वाला या ऐसे किसी संगठन में शामिल होने वाले किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता था।

जापान में सैनिक फासीवाद

  • 1920 ई. के दशक में जापान संसदीय शासन-व्यवस्था की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता प्रतीत हो रहा था।
  • 1924 ई. में सभी पुरूषों को मताधिकार दे दिया गया लेकिन स्त्रियों को अब भी इससे वंचित रखा गया।
  • सेना देश के राजनीतिक जीवन में एक प्रमुख शक्ति बनी रही और 1930 ई. के दशक को आरम्भ से सरकार पर उसका वर्चस्व लगातार बढ़‌ता चला गया।
  • जापानी सेना जापानी समाज की सबसे प्रबल शक्ति थी। कई गुप्त समितियाँ गठित की गई थी, जिनसे सेना के घनिष्ठ संबंध थे। वे सभी समितियाँ उदारवादी, शांतिवादी तथा लोकतांत्रिक विचारों पर प्रहार करती रहती थी।
  • वे शांति समाजवाद तथा लोकतंत्र के विचारों को विदेशी विचार बताती थीं और इनसे जापान को बचाए रखना आवश्यक बताती थीं। जापान के राष्ट्रीय तत्व के संबंध में इन समितियों की अपनी कुछ खास धारणाएँ थीं।
  • सम्राट-पूजा का भाव उन सभी में था। वे इस विश्वास का प्रचार करती थी कि सम्राट के लिए मरने का मतलब अमर हो जाना है।
  • दो युद्धों के मध्य जापानी सरकार द्वारा अपनाई गई दमन नीति के कारण साम्यवादी और समाजवादी लोकतांत्रिक दल बिल्कुल पृथक् हो गए थे। जो राजनीतिक प्रणाली जापान में उभरी उसे सैनिक फासीवार कहा जा सकता है।
  • 1926 ई. में हिरोहितो को उत्तराधिकार में जापान का सम्राट-पद मिला।

🔺1868 ई. में जिस सम्राट के अधीन जापान का आधुनिकीकरण आंरभ हुआ था, उसके शासन को मेजी अथवा प्रबुद्ध शासन कहा जाता था।

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *