वैदिक काल – परिभाषा, प्रकार, सैन्य संगठन एवं युद्ध कला | Vedic Period in hindi

वैदिक काल क्या है

वैदिककाल का प्रारम्भ सिन्धु घाटी की सभ्यता के अन्तिम चरण में माना जाता है। इसी समय मध्य एशिया से भारत में आर्यों का पदार्पण हुआ। यद्यपि कुछ इतिहासकार भारत को ही आर्यों का मूल स्थान मानते हैं, किन्तु उनके मत के तथ्य प्राप्त नहीं हैं। आर्यों की उत्पत्ति कहीं से भी हुई हो पर यह निश्चित है कि आर्यों के प्रभाव तथा प्रसार के साथ ही वैदिककाल का प्रारम्भ होता है। वैदिककालीन सैन्य संगठन तथा युद्धकला के अध्ययन के लिए ‘ऋग्वेद’ अपना विशेष स्थान रखता है। इतिहासकार इस काल की अवधि 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक मानते हैं ।

‘रामायण’ और ‘महाभारत’ आर्यों के दो प्रमुख महाकाव्य माने जाते हैं। ये दोनों महाकाव्य वास्तव में महान् युद्धों के इतिहास हैं। रामायण राम और रावण के लम्बे और घोर युद्ध का वर्णन करती है। यह युद्ध आर्यों और अनार्यों का युद्ध कहा जा सकता है। महाभारत का प्रमुख विषय भी युद्ध है, जिसमें आर्यों और अनार्यों के मध्य एक बड़े गृह-युद्ध का वर्णन है। यह कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरवों और पाण्डवों के मध्य हुआ था। यह काल लगभग 800 ई. पूर्व तक माना जाता है।

वैदिक काल की राजनीतिक व्यवस्था

वैदिककाल में आर्य खानाबदोश कबीलों के रूप में रहते थे। उनकी कोई ठोस व निश्चित सैन्य व्यवस्था नहीं थी, परन्तु महाकाव्य काल में वैदिक युग द्वारा निर्मित वर्ण व्यवस्था अधिक विकसित हो गयी थी। राष्ट्र के शासन में क्षत्रियों का पूर्ण आधिपत्य जम गया था। सब प्राणियों की रक्षा करना, युद्ध के लिए तैयार रहना, युद्ध में मृत्युपर्यन्त डटे रहना आदि क्षत्रियों के प्रमुख कर्तव्य समझे जाते थे। क्षत्रियों के साथ ब्राह्मण वर्ग के लोग भी सैनिक क्रियाओं में भाग लेने लगे थे। महाभारत, के उदाहरणों से यह विदित होता है कि ब्राह्मणों की तप मन्त्र की शक्ति युद्ध विषय में उतनी ही महत्त्वपूर्ण समझी जाती थी जितनी कि क्षत्रियों के शस्त्रास्त्रों की शक्ति।

सैन्य संगठन

वैदिककाल में राज्य की कोई स्थायी सेना नहीं होती थी। युद्धकाल में स्थानीय क्षत्रिय अपने-अपने शस्त्रों के साथ-साथ कुल के प्रधान नायक के नेतृत्व में एकत्रित होते थे। यह पद्धति किसी सीमा तक मध्यकालीन जागीरदारी प्रथा के समान थी। इस युग की सेना को ‘पृतना’ नामक टुकड़ी में संगठित किया जाता था, जो अपने अधिकारी ‘नामक’ के नेतृत्व में कार्य करती थी। युद्धों में सैनिकों की विशाल संख्या होती थी।

सेना के अंग

वैदिककाल में मुख्यतः दो ही प्रकार की सेना का उल्लेख मिलता है— रथ सेना और पैदल सेना। पैदल सेना की अपेक्षा रथ सेना का अधिक महत्व समझा जाता था।

सैन्य प्रशिक्षण

वैदिककाल में स्थाई सेना न होने के कारण सैनिक शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए राजकीय प्रबन्ध नहीं होता था । सम्भवतः बस्तियों में ब्राह्मण व्यक्तिगत विद्यालय खोलकर बस्ती के क्षत्रिय युवकों को शस्त्र विद्या सिखाते होंगे अथवा पुत्र को पिता द्वारा सैनिक कार्यों का ज्ञान कराया जाता रहा होगा।

अस्त्र-शस्त्र

वैदिक युग में मुख्य आक्रमणात्मक शस्त्र धनुष-बाण थे। इसके अतिरिक्त पशु, तलवार, परतला, बल्लम, कर्तन (कटार), सत (मुगदर) आदि का उल्लेख मिलता है। साथ ही सुरक्षा हेतु सिर पर शिस्त्राण, कन्धे पर ढाल, वक्षस्त्राण, हाथों में दस्ताना आदि मुख्य थे। इन शस्त्रास्त्रों के अतिरिक्त आग्नेय शस्त्रों का भी आभास मिलता है। ऋग्वेद संहिता में अग्नि की शत्रु की पराजय के लिए स्तुति की गई है।

दुर्ग-रचना

वैदिक युग में आर्यों द्वारा निर्मित दुर्गों का उल्लेख नहीं किया गया है, बल्कि अनार्यों द्वारा अपनी बस्तियों के चारों तरफ परिखा तथा परकोटा आदि निर्मित दुर्गों पर आर्यों द्वारा अपना अधिकार स्थापित कर उन्हीं को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। ये दुर्ग पत्थर और ईंटों के बने होते थे। ऋग्वेद में एक स्थान पर लोहपुरी का उल्लेख मिलता है और ऐसी ही एक पुरी को इन्द्र द्वारा ध्वस्त करने का वर्णन किया गया है, किन्तु कहीं भी दुर्गों के निर्माण का वर्णन नहीं है ।

व्यूह-रचना

वैदिक युग में व्यूह-रचना का आभास मात्र ही होता है। किन परिस्थितियों में किन-किन व्यूहों का प्रयोग किया जाता था इसका स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है।

युद्ध कला

वैदिककाल में जब शत्रु आर्यों की सीमा में पहुँचता था तो पत्थरों, ईंटों के टुकड़े फेंके जाते थे। ईश्वर की स्तुति का युद्ध गीतों के साथ सैनिक आगे बढ़ते थे। योद्धा रथों पर खड़े होकर और पैदल सैनिक निकट पंक्ति में लड़ते थे। विजयी होने पर उत्सव मनाया जाता था ।

युद्ध-विधि

वैदिक युग में मैदानी युद्धों का प्रचलन था। युद्ध की दृष्टि से उपयुक्त रणक्षेत्र का चयन किया जाता था। इस युग में धर्म युद्ध व कूट युद्ध जैसा कोई भेद नहीं किया गया था।

युद्ध-संगीत

वैदिककाल में युद्धों में वाद्य-यन्त्रों का दीर्घ पैमाने पर प्रयोग किया जाता था। इन वाद्य-यन्त्रों के घनघोर गर्जन से दुश्मन के मनोबल का ह्रास होता था। इन वाद्य-यन्त्रों में दुन्दभि व नगाड़े प्रमुख थे।

चर एवं दूत

चर एवं दूत व्यवस्था का ज्ञान व वैदिक साहित्य से भी होता है। इस काल में गुप्तचरों के अलावा दूतों का भी प्रयोग किया जाता था रामायण तथा महाभारतकाल में इसका अधिक स्पष्ट वर्णन मिलता है। शत्रु-सेना की सैनिक गतिविधियों के बारे में दूतों द्वारा जानकारी प्राप्त करने की प्रथा हर युद्ध में, हर देश में पायी जाती थी। राम और रावण ने भी एक-दूसरे की सेना के बारे में पता चलाने के लिए गुप्तचरों का प्रयोग किया था। दुर्योधन ने पाण्डवों का पता लगाने के लिये गुप्तचरों को भेजा था। युद्ध आरम्भ करने से पहले अपनी बात मनवाने या युद्ध के लिये तैयार होने का सन्देश दूतों द्वारा भेजा जाता था। रामायण में अंगद तथा महाभारत में श्रीकृष्ण की भूमिका दूतों की ही थी।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. वैदिक कालीन सैन्य संगठन एवं युद्धकला की समीक्षा कीजिए।
प्रश्न 2. सैन्य संगठन तथा युद्ध कला के क्षेत्र में वैदिक काल तथा महाकाव्यकाल की तुलनात्मक व्याख्या कीजिए।
प्रश्न 3. वैदिक काल से आप क्या समझते है? वैदिक युग की विशेषताओं का वर्णन कीजिए तथा ऋग्वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में अंतर स्पष्ट कीजिए।

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