Q.1 वृत्तीय गति क्या है?

Ans. जब कोई कण एक वृत्तीय पथ पर गति करता है तो उसकी गति वृत्तीय गति कहलाती है, वृत्तीय गति दो प्रकार की होती है। (1). एकसमान वृत्तीय गति, (2). असमान वृत्तीय गति।

1. एकसमान वृत्तीय गति - जब कोई कण एकसमान चाल से वृत्तीय पथ पर गति करता है तो कण की यह गति एकसमान वृत्तीय गति कहलाती है। एकसमान वृत्तीय गति में कण की रेखीय चाल, गतिज ऊर्जा तथा कोणीय संवेग नियत रहते हैं।

2. असमान वृत्तीय गति - यदि कोई कण परिवर्ती चाल से वृत्तीय पथ पर गति करता है तो उसकी गति असमान वृत्तीय गति कहलाती है।

Q.2 परिवर्ती वृत्तीय गति में कण का त्वरण क्या है?

Ans. यदि कण परिवर्ती वृत्तीय गति कर रहा हो तथा उसकी त्रिज्या त्वरण a_r व स्पर्शरेखीय त्वरण a_t हो तब कण का परिणामी त्वरण, a = √(a^2_r + a^2_t)

Q.3 कोणीय वेग से आप क्या समझते हैं?

Ans. वृत्तीय गति करते किसी कण के कोणीय विस्थापन के परिवर्तन की समय-दर को उस कण का कोणीय वेग कहा जाता है। इसे ω से प्रदर्शित करते हैं। इसका मात्रक रेडियन/सेकण्ड होता है।

कोणीय वेग तथा रेखीय वेग में संबंध रेखीय वेग v = त्रिज्या r × कोणीय वेग ω अतः नियत कोणीय वेग से गति करता हुआ कोई कण केन्द्र से जितनी अधिक दूरी पर चल रहा होता है उसका रेखीय वेग भी उतना ही अधिक होगा।

Q.4 कोणीय विस्थापन से क्या तात्पर्य है?

Ans. एकसमान वृत्तीय गति करते हुए एक कण की त्रिज्य सदिश एक निश्चित समयान्तराल में जितना कोण घूम जाता है वह गतिमान कण का कोणीय विस्थापन कहलाता है।

Q.5 अपकेन्द्र बल को छद्म बल क्यों कहते हैं?

Ans. जब वस्तु वृत्तीय गति करते निकाय के अन्दर होती है, तो इसके द्वारा अपकेन्द्र बल का केवल आभास होता है जबकि वस्तु पर यह बल वास्तव में कार्य नहीं करता है। इसलिए इसे छद्म बल कहते हैं।

Q.6 अभिकेन्द्र त्वरण से क्या तात्पर्य है?

Ans. वृत्तीय गति करते कण पर एक त्वरण कार्य करता है जिसकी दिशा सदैव वृत्तीय पथ के केन्द्र की ओर होती है जिसे अभिकेन्द्र त्वरण कहते हैं। सूत्र, a = rω^2

Q.7 अभिकेन्द्र बल से क्या तात्पर्य है?

Ans. वृत्तीय गति करते हुए पिण्ड पर एक बल कार्य करता है जिसकी दिशा सदैव वृत्त के केंद्र की ओर होती है इस बल को अभिकेन्द्र बल कहते हैं।

Q.8 पृथ्वी को सूर्य के चारों ओर घूमने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल कहां से प्राप्त होता है?

Ans. पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक वृत्तीय पथ पर घूमती है अतः इस पर एक अभिकेन्द्र बल लगता है जिसकी दिशा सदैव सूर्य की और रहती है। पृथ्वी को यह बल सूर्य द्वारा पृथ्वी पर आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल से मिलता है।