जेनर डायोड क्या है, परिभाषा, उपयोग, कार्यविधि तथा अभिलाक्षणिक वक्र खींचिए | Zener Diode in Hindi

जेनर डायोड क्या होता हैं? – इस अध्याय में हम जेनर डायोड के बारे में विस्तार से सरल भाषा में अध्ययन करेंगे। और इसमें हम जेनर डायोड के उपयोग, कार्यविधि, चित्र आरेख तथा वोल्टता नियंत्रक के रूप में जेनर डायोड कैसे कार्य करता है और इसके अविष्कार के बारे में भी विस्तार से समझेंगे।

जेनर डायोड क्या है

जेनर डायोड (अथवा भंजन डायोड) एक निश्चित रूप से भंजन वोल्टता के लिए बनाया गया p-n संधि डायोड होता है जो उत्क्रम (पश्च) अभिनति में भंजन वोल्टता पर खराब हुए बगैर सतत् रूप से कार्य कर सकता है। भंजन वोल्टेज का मान P व N प्रकार के अर्द्ध-चालकों में निर्मित अधिक अपमिश्रित अशुद्धि घनत्व पर निर्भर करता है। यदि अपमिश्रण अधिक होता है, तो सन्धि डायोड की उत्क्रम अभिनति में जेनर भंजन होता है। और यदि अपमिश्रण कम होता है तो एवलांशी भंजन होता है।
इस प्रकार, अपमिश्रण की मात्रा को बदलकर भिन्न-भिन्न भंजन वोल्टेज कम हो जाते है। तथा अपमिश्रण कम होने पर जेनर भंजन वोल्टेज अधिक हो जाता है।

जेनर डायोड का प्रतीक चिन्ह

जेनर डायोड का परिपथ आरेख चित्र-1 में दर्शाया गया है।

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जेनर डायोड का प्रतीक चिन्ह
जेनर डायोड का प्रतीक चिन्ह

वैसे तो जेनर डायोड p-n सन्धि डायोड का ही एक विशेष रूप होता है, परन्तु इसमें कुछ गुण पाए जाते हैं अतः ये कुछ गुण ही p-n सन्धि को ‘जेनर डायोड’ (zener diode in Hindi) बनाते हैं। जेनर डायोड का आविष्कार वैज्ञानिक क्लारेंस जेनर (Clarence Zener) ने किया था। जेनर डायोड कोई युक्ति नहीं है, बल्कि यह एक प्रकार से p-n सन्धि डायोड ही होता है।

जेनर डायोड रेगुलेटर का उपयोग क्यों किया जाता है?

जेनर डायोड का विभव धारा वोल्टता का अभिलाक्षणिक वक्र को नीचे परिपथ आरेख में प्रदर्शित किया है। जेनर भंजन के बाद उत्क्रम (पश्च) वोल्टता में सूक्ष्म परिवर्तन करने पर ही पश्च धारा में अत्यधिक परिवर्तन हो जाता है। अतः यह भाग धारा अक्ष के लगभग समान्तर होता है। स्पष्टतः जेनर डायोड में होकर बहने वाली पश्च धारा को बदलने पर भी विभवान्तर लगभग नियत रहता है।
इस प्रकार, जेनर डायोड पर विभव एक निर्देश की भांति व्यवहार करता है इसलिए इस डायोड को ‘निर्देश डायोड’ (reference diode) भी कहते हैं। तथा इसे मुख्यतः ‘वोल्टेज रेगुलेटर’ की भांति उपयोग में लाया जाता है।

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जेनर डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र

जेनर डायोड के V-I अभिलाक्षणिक वक्र को चित्र-2 में दर्शाया गया है।

जेनर डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र
जेनर डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र

चित्र-2 की भांति जब जेनर डायोड को अग्र अभिनति में जोड़ा जाता है तो ये एक p-n सन्धि की भांति कार्य करता है, परन्तु जब इसे उत्क्रम अभिनति में जोड़ा जाता है तब इसमें जेनर भंजन वोल्टेज उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार ये बिना किसी खराबी के लगातार काम करता रहता है।

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जेनर डायोड की कार्यविधि

हम जानते हैं कि जेनर डायोड की सन्धि पतली होती है अतः अल्प पश्च अभिनति वोल्टेज लगाने पर ही सन्धि पर तीव्र विद्युत् क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है जिससे बहुत अधिक संख्या में सह-संयोजक बंध टूटने से इलेक्ट्रॉन उत्पन्न हो जाते हैं। अतः इसका ताप बढ़ाने पर वर्जित ऊर्जा अन्तराल छोटा हो जाता है तथा जेनर भंजन और भी कम वोल्टेज पर उत्पन्न होने लगता है। जेनर वोल्टेज पर सन्धि डायोड का प्रतिरोध अचानक घट जाता है और भंजन धारा अथवा पश्च धारा अचानक बढ़ जाती है। उत्क्रम वोल्टेज को हटाने पर जेनर डायोड की सन्धि पुनः अपनी मूल अवस्था में वापस आ जाती है।

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नोट – समझाइए कि जेनर डायोड एक लोड प्रतिरोध के सिरों पर नियत वोल्टेज को किस प्रकार बनाए रखता है।

जेनर डायोड द्वारा वोल्टेज नियंत्रण

जेनर डायोड का वोल्टेज रेगुलेटर की भांति उपयोग किया जाता है। यदि बाह्य विभव V तथा प्रतिरोध R का मान इस प्रकार लिया जाता है कि डायोड धारा एक निश्चित सीमा में रहें तथा डायोड भंजन क्षेत्र में कार्य करें। जेनर डायोड को वोल्टेज नियंत्रक के रूप में प्रयुक्त करने के लिए आवश्यक परिपथ को चित्र-3 में प्रदर्शित किया गया है।

जेनर डायोड द्वारा वोल्टेज नियंत्रण

इस स्थिति में सप्लाई विभव V अथवा लोड प्रतिरोध RL बदलने पर भी लोड प्रतिरोध RL के सिरों पर विभवान्तर V0 नियत रहता है।
प्रायः बाह्य आरोपित विभव V डी.सी. पावर सप्लाई से प्राप्त विभव है जिसमें कुछ ऊर्मिकायें या ए.सी. अवयव शेष रह जाते हैं जिससे विभव V स्थायी या नियंत्रित नहीं होता है। यहां जेनर डायोड पर विभव V इस प्रकार आरोपित किया जाता है कि जेनर डायोड उत्क्रम (पश्च) अभिनति में रहें।

माना चित्र-3 में परिपथ से ली गई धारा i है। जेनर डायोड से प्रवाहित धारा i1 तथा लोड प्रतिरोध RL से प्रवाहित धारा i2 है तो किरचाॅफ के नियमों के अनुसार,
i = i1 + i2 …(1) तथा V0 = V – iR एवं V0 = i1RL

अतः इसे हल करने के लिए दो स्थितियां होती हैं।
स्थिति-1 यदि सप्लाई विभव V नियत रहता है तथा लोड प्रतिरोध RL बदलता है तो चूंकि जेनर डायोड विभव V0 नियत रहता है।
अतः समीकरण V0 = V – iR से δi = 0
परन्तु समीकरण (1) में δ रखने पर,
δi = δi1 + δi2 अतः δi1 + δi2 = 0 या δiz = – δiL
स्पष्टतः बाह्य आरोपित विभव नियत रखकर लोड प्रतिरोध RL बढ़ाने पर लोड धारा i2 जितनी घटती है जेनर डायोड धारा i1 उतनी ही बढ़ती है जिससे कि कुल धारा i नियत रहती है।

स्थिति-2 यदि लोड प्रतिरोध RL नियत रहता है तथा सप्लाई विभव V है तो V0 नियत रहता है।
अतः समीकरण V0 = V – iR से δV = Rδi
तथा समीकरण V0 = i1RL से δi2 = 0
अतः समीकरण i = i1 + i2 से δi = δi1
स्पष्टतः नियत लोड प्रतिरोध RL पर सप्लाई विभव बदलने से कुल धारा i तथा जेनर डायोड धारा i1 में समान परिवर्तन होता है लेकिन लोड धारा i2 नियत रहती है।

Note – जेनर डायोड से सम्बन्धित प्रशन पूछें जाते हैं –
Q.1 जेनर डायोड क्या है? जेनर डायोड का V-I अभिलाक्षणिक वक्र खींचिए तथा उसका उपयोग बताइए।
Q.2 जेनर डायोड क्या है? जेनर डायोड का उपयोग वोल्टेज रेगुलेटर के रूप में परिपथ आरेख की सहायता से समझाइए।
Q.3 जेनर डायोड किसे कहते हैं? इसकी धारा-वोल्टता का अभिलाक्षणिक वक्र खींचिए तथा समझाइए कि यह वोल्टता नियंत्रक के रूप में कैसे काम करता है।
Q.4 उचित परिपथ आरेख की सहायता से वोल्टता नियंत्रक के रूप में जेनर डायोड की क्रिया-विधि समझाइए।

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